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Sri Banke Bihari ke sawaiya, 34 of 144, वे तो लली वृषभान लली की गली के गुलाम हैं

Sawaiya verses are part of the rich literary heritage of Braj (Mathura-Vrindavan). They are dramatised in raslila performances.

३४.

द्वार के द्वारिया पौरि के पौरिया पाहरुवा घर के घनश्याम हैं।

दास के दास सखीन के सेवक पार परोसिन के धन धाम हैं॥

‘श्रीधर’ कान्ह भये बस भामिनि मान भरी नहीं बोलत बाम है।

एक कहै सखि वे तो लली वृषभान लली की गली के गुलाम हैं॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 33 of 144 ‘रसखान’ गोविन्द को यों भजिये जिमि नागरि को चित गागरि में

३३.

सुनिये सब की कहिये न कछू, रहिये इमिया भव वागर में।

करिये व्रत नेम सचाई लिये जेहि सों तरिये भवसागर में॥

मिलिये सब सों दुरभाव बिना रहिये सतसंग उजागर में।

‘रसखान’ गोविन्द को यों भजिये जिमि नागरि को चित गागरि में॥

vishnu-govind


Raskhan says in this sawaiya verse:

Live your daily life normally, but keep your mind on Govind. Just as a village belle returning from the river, carrying pots full of water on her head is behaving normally with her friends, chatting, greeting, walking… Yet, her attention never leaves her water pots on her head. If she is not attentive to her pots, they could crash any time!

Sri Banke Bihari ji ke sawaiye, 32 of 144, A search for nirgun and sagun Brahman

३२.

ब्रह्म में ढूंढ्यो पुरानन वेदन भैद सुन्यो चित चौगुने चायन।

देख्यो सुन्यो न कहूं कबहूं वह कैसे स्वरूप औ कैसे सुभायन॥

ढूंढत ढूंढत हारि परयो ‘रसखानि’ बतायो न लोग लुगायन।

देख्यो कहां वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटन राधिका पायन॥

This sawaiya verse illustrates poet Raskhan’s search for nirgun and sagun Brahman.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 31 of 144

३१.

धूरि भरे अंग सोहन मोहन आछी बनी सिर सुन्दर चोटी।

खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनियां कटि पीरी कछौटी।।

या छवि कूं ‘रसखान’ विलोकत बारत काम कलानिधि कोटी।

काग के भाग कहा कहिये हरि हाथ ते लै गयो माखन रोटी॥

A Braj sawaiya by poet Raskhan.

Sri Banke Bihari ke sawaiya, 28 of 144

२८.

बैठी हती गुरु लोगन में मन ते मनमोहन को न विसारति।

त्यों नन्दलाल जू आय गये बन ते सिर मोरन पंख संवारत॥

लाज ते पीठ दै बैठि बहू, पति मातु की आंख ते आंखिन टारति।

सासु की नैंन की पूतरी में निज प्रीतम को प्रतिबिम्ब निहारति॥

This sawaiya verse says:

A Gopi is sitting amidst family elders, and is thinking of Krishna. Just then Krishna arrives from the jungle, with a peacock feather tucked in his hair.

The Gopi feels shy and turns her back to Krishna, while looking into her mother-in-law’s eyes to catch his reflection there.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 27 of 144

२७.

ज्यों भरि कै जल तीर धरी निरखे त्यों अधीर ह्वै न्हात कन्हाई।

जानैं नहीं तेहि ताकन में ‘रतनाकर’ कीन्ही महा टुनहाई॥

छाई कछू हरू आई शरीर में नीर में आई कछू गरुआई।

नागरी की नित की जो सधी साई गागरी आज उठ न उठाई॥

Sri Banke Bihari ke sawaiya, 26 of 144

२६.

दे लिखि बांहन पे व्रजचन्द्र सो गोल कपोलन कुंज बिहारी।

त्यों ‘पदमाकर’ हीय हरी लिखि गोसो गोविन्द गरे-गिरिधारी॥

या बिधि ते नख से सिख लौं लिख कन्त के नाम अनन्त है प्यारो।

गोरे से अंग में गोद दे श्याम सो हे गोदनान की गोदनहारी॥

In this sawaiya verse by Braj poet Padmakar, in fond remembrance of Krishna (smaran bhakti, स्मरण भक्ति) Gopi is asking a tattoo-maker to tattoo several of Krishna’s names on her body.

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