Sri Banke Bihari ji ke sawaiye, 32 of 144, A search for nirgun and sagun Brahman

ढूंढत ढूंढत हारि परयो ‘रसखानि’ बतायो न लोग लुगायन। देख्यो कहां वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटन राधिका पायन॥ This sawaiya verse illustrates poet Raskhan’s search for nirgun and sagun Brahman.

07 May, 2010

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 31 of 144

या छवि कूं ‘रसखान’ विलोकत बारत काम कलानिधि कोटी। काग के भाग कहा कहिये हरि हाथ ते लै गयो माखन रोटी॥ A Braj sawaiya by poet Raskhan.

07 May, 2010

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 23 of 144

When Radha was annoyed with Krishna, Krishna bowed at her feet requesting her for truce. He didn’t really know how to please her. Neither did Radha really know how to show anger, observes the poet.

04 April, 2010

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 22 of 144

दीन दयाल सुने जब ते, तब ते मन में कछु ऐसी बसी है । तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ, तुम्हरे हित की कटि फेंट कसी है ॥ In this sawaiya verse, Malook says to Krishna: Ever since I’ve heard of your merciful nature, I have surrendered myself to you. Now that

03 April, 2010

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya 21 of 144

२१. सावन तीज सुहावन कों सखि, सोहैं दुकूल सवै सुख साधा । देखे बनैं कहते न बनैं, उमगै उर में अनुराग अबाधा ॥ प्रेम के हेम हिंडोरन में, सरसै बरसै रस रंग अगाधा । राधिका के हिय झूलत साँवरो, साँवरे के हिय झूलति राधा ॥ This sawaiya

02 April, 2010

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 19 of 144

In my next birth, if I am born as a human being, I wish to be born in Gokul as a cowherd boy (so that I get Krishna’s company). If I am born as an animal, I wish I could be a cow in the herd of Nand baba (Krishna’s father) and graze with them. If I

02 April, 2010



Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 18 of 144

१८. राधिका कान्ह को ध्यान धरैं, तब कान्ह ह्वै राधिका के गुण गावैं । त्यों अँसुवा बरसैं बरसाने को पाती लिखैं लिखि राधे को ध्यावैं ॥ राधे ह्वै जायँ घरीक में ‘देव’ सु प्रेम की पाती लै छाती लगावैं । आपने आप ही में उरझैं सुरझैं , उरझैं,

21 October, 2009

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 20 of 144

Krishna painting

मानस हों तो वही ‘रसखान’, मिलूँ पुनि गोकुल गाँव के ग्वारन । जो पसु होऊँ कहा वस मेरो, चरूँ पुनि नन्द के धेनु मझारन ॥ पाहन हों तो वही गिरि को, जो कियो जिमि छत्र पुरंदर कारन । जो खग हो‍ऊँ वसेरो करूँ, नित कालन्दी कूल कदम्ब की डारन ॥ Raskhan says

13 November, 2009



Zero Budget Natural Farming Program Part-1 from 27-29 Oct 2013 at Mirzapur