Anandway: Blog

Roadmaps to joy!

On track

When you want to do something, look at your strength. Your weakness is that you start looking at others' strengths! When you are running, you can only look at the track below, not at who's next to you. Like a horse with blinders, you just look at your path and let anybody do whatever he/she wants.

~ Sri Sri Ravi Shankar

Who is a volunteer?

Sri Sri Ravishankar

Who is a volunteer? One who comes to help, without being asked to help; one who is self-motivated, inspired, becomes a volunteer.

There is the possibility of the inspirational motivation going down in a volunteer, which could bring frustration.

Usually volunteers come from the space of demand rather than humility – this dilutes the quality.

Another slack that could happen to a volunteer is that they could slip away from commitment, thinking there is no 'boss' – "If I like it, I do it; if I don't like it, I don't!" It is like the steering wheel of a car – if all the tires say they do not need steering, then the car cannot run smoothly. If you want to construct a building, you have to accept the authority of the structural engineer.

All these can only be overcome by being more grounded in spiritual knowledge. A volunteer devoid of spiritual dimension is utterly weak.

1) A volunteer needs to stick to his commitment.

2) The integrity in a volunteer comes from spiritual practices.

3) The authority needs to be acknowledged.

4) The strength of a volunteer comes from the challenges he is ready to willingly face.

5) A volunteer moves beyond boundaries as he finds he is capable of doing so many things he never ever thought of doing.

6) A true volunteer does not expect appreciation or reward.

7) A volunteer has such a joy – that joy, itself, comes as the reward.

8) If a volunteer thinks he is obliging somebody, he is thoroughly mistaken. He is 'volunteering' because he derives so much joy out of it.

The joy is immediate – it does not come on the first of every month in the form of a salary!

When a volunteer realizes this, he is filled with gratitude.

When a volunteer waivers from within, the support system is knowledge and good friends.

Death and enlightenment

You have died many times and you have been born many times. If you can die every moment and be born every moment then that is enlightenment and that is happiness. Being in NOW is enlightenment!

~ Sri Sri Ravi Shankar

ब्रह्मदर्शन की रीति आ गई तो जहां दृष्टि पड़ी, ब्रह्मानन्द लूटने लगे

  • उपासना की जान समर्पण और आत्मदान है, यदि यह नहीं तो उपासना निष्फल और प्राण रहित है।
  • जिस जाति में भलाई, सत, या ईश्वर पर विश्वास, श्रद्धा या इसलाम नहीं हैं, वह जाति विजय नहीं पा सकती।
  • जब तक सांसारिक दृष्टि वाली श्रद्धा, सीधी होकर आत्मा (कृष्णः) की सहगामिनी और तद्रूपा न होगी तब तक न तो अहंकार (कंस) मरेगा, और न स्वराज्य मिलेगा। मारो ज़ोर की लात इस उल्टे विश्वास को, अलिफ़ की भांति सीधी कर दो इस कुमारी श्रद्धा की कमर।
  • ब्रह्मदर्शन की रीति आ गई तो जहां दृष्टि पड़ी, ब्रह्मानन्द लूटने लगे। प्रतीक उपासना तब सफल होती है जब वह हमें सर्वत्र ब्रह्म देखने के योग्य बना दे। सारा संसार मन्दिर बन जाये, हर पदार्थ राम की झांकी दिखाये और हर क्रिया पूजा हो जाये।
  • वह आत्मदेव जिसकी शक्ति से संपूर्ण संसार स्थिर है और जिसकी शक्ति से संपूर्ण कामनायें पूरी होती हैं, उसको कोई विरले ही मांगते हैं और शेष सब संसारी वस्तुपं को, जो बिल्कुल तुच्छ, हीन और वास्तव में अवस्तु हैं, मांगते रहते हैं।
  • धर्म शरीर और बुद्धि का आधार है। मन और बुद्धि का ईश्वर में लीन हो जाना ही धर्म है – ईश्वर को मानने वाले की बात और होती है और जानने वाले की और।
  • वह व्यक्ति जो अपने समय का ठीक ठीक सदुपयोग करता है, सच पूछो तो वही जीवित मनुष्य कहलाने का अधिकारी है।
  • वह व्यक्ति जिसको संसार के विषय और वासनायें नहीं हिला सकतीं, वह निस्सन्देह सारे संसार को हिला सकेगा।
  • पवित्र आचरण, जितेन्द्रिय और शुद्ध विचारों से भरे हुये, सच्चे निश्चय वाले मनुष्य का शरीर और मन प्रकाश स्वरूप हो जाता है और ईश्वर का तेज और शान्ति-आभा उसके मुख मंडल पर साफ़ चमकने लगते हैं।

~ स्वामी रामतीर्थ (१८७३-१९०६)

Swami Ramtirtha’s message on Love and Sacrifice

  • विषय वासना-हीन प्रेम ही आध्यात्मिक प्रकाश है।
  • प्रेम का अर्थ है, व्यवहार में अपने पड़ोसियों के साथ, उन लोगों के साथ जिनसे आप मिलते जुलते हैं, एकता और अभेदना का अनुभव करना।
  • कामना रहित कर्म ही सर्वोत्तम त्याग अथवा पूजा है।
  • अहंकार-पूर्ण जीवन को छोड़ देना ही त्याग है, और वही सौंदर्य है।
  • एक-एक में और सब में ईश्वरत्व का भान करना ही वेदान्त के अनुसार त्याग है।
  • त्याग के अतिरिक्त और कहीं वास्तविक आनन्द नहीं मिल सकता; त्याग के बिना न तो ईश्वर-प्रेरणा हो सकती है, न प्रार्थना।
  • सच्चा प्रेम, सूर्य के समान, आत्मा को विकसित कर देता है – मोह मन को पाले के समान ठिठुराकर संकुचित कर डालता है।
  • प्रेम को मोह मत समझो – प्रेम और है, मोह और है – इन्हें एक समझना भारी भूल है।
  • प्रेम का अर्थ है सौंदर्य का दर्शन करना।

~ स्वामी रामतीर्थ

 

Swami Ramtirtha’s quote on Brahman

“ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है – नामरूपात्मक जगत मिथ्या है।”

~ स्वामी रामतीर्थ

Only Brahma is. This world with all its names and forms is not the absolute truth. (translated)

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