February 8, 2012 05:48 by
anisha
चित्त की शांति के लिये ख़ाली मन को ईश्वर की याद में भरकर र्खा जाये, तो यह सब से अधिक लाभदायक होगा। भंग या शराब हम में मस्ती नहीं भर सकती, मस्ती तो स्वयं हमारे ही अंदर है। मुसीबतों, बीमारियों, तकलीफ़ों और क्लेशों को ईश्वर का आशीर्वाद समझो जो हाथी के अंकुश की नाई तुमको ठीक उसी रास्ते पर लगाये रहते हैं। - यहां शोक, दुख, क्लेश और मुसीबतों की ज़िंदगी तो अवश्य ही है किन्तु यदि तुम इनसे बचना चाहो तो शुद्ध और सात्विक विचारों की वायु अपने चारों ओर फैलाते रहो – इस प्रकार सांसारिक चिन्ताओं की विषैली गैस तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी।
- वे लोग जो सदाचारी हैं और न्याय-संगत तथा स्वार्थ रहित जीवन, दूसरों की भलाई व सेवा में बिताते हैं, सच पूछा जाये तो वही ईश्वर की सच्ची सेवा करते हैं।
- ईश्वर को याद करते समय अपने आप को उसके समक्ष पूर्ण रूप से आत्म समर्पण कर दो और अपने जीव भाव को ईश्वरत्व के विश्वव्यापी भाव में विलीन कर दो, अर्थात अपने जीव की परिछिन्नता तो ईश्वर की अपरिछिन्नता में तल्लीन कर दो।
~ स्वामी रामतीर्थ (२२ अक्तूबर १८७३- दीपावली १९०६)