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Sri Banke Bihari ke sawaiya, 7 of 144, poems from Vrindavan

७.
कलिकाल कलेशन काटें सवै, जन कण्टक मैंट हरैं भव बाधा ।
निसि वासर सुक्ख अनन्त मिलैं, मन मोद प्रमोद समोद अगाधा ॥
बनराज निकुन्ज निवासी बनैं, यमराज समाज समावे समाधा ।
छवि छैल ‘छबीले’ की जीवनज्योति, जपै जब कीरतनंदनी राधा ॥

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