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Roadmaps to joy!

Come to me, a poem by Gurudev Sri Sri Ravi Shankar

Beyond the heaven is my abode
come to me. come to me.
Don't stop, come to me.
If you get stuck in the heaven,
you will return back from there to hell.
Don't stop in the heaven, come to me, come to me.

My abode is beyond heaven, far away from here.
Come to me, come to me
All the charming faces, boys and girls, eyes and noses,
hairs and dresses, cookies and sweets and chocolates,
pass them on.
Smiling and dancing, come to me, come to me.

My abode is beyond the heaven.
come to me.
Joyfully move in this direction, a thousand blessings on the way.
walk through them, don't get stuck.
Pass through them.
come to me.

Angels are ready to serve you, and crown you with the highest.
Don't stop before that.
Come to me, come to me...

--
H.H. Sri Sri Ravi Shankar

मंगल मूरति, मारुति नंदन सकल अमंगल मूल निकंदन

मंगल मूरति, मारुति नंदन

सकल अमंगल मूल निकंदन

पवन तनय, संतन हितकारी

हृदय विराजत अवध बिहारी

मंगल मूरति, मारुति नंदन

मात पिता, गुरु, गणपति, सारद

शिवा समेत शंभु, शुक, नारद

मंगल मूरति, मारुति नंदन

चरण कमल बंदौ सब काहू

देहु राम पद नेह निबा��ू

मंगल मूरति, मारुति नंदन

बंदौ राम, लखन, बैदेही

जो तुलसी के परम सनेही

मंगल मूरति, मारुति नंदन

जय जय जय हनुमान गोसाई

कृपा करहु, गुरुदेव की नाई

मंगल मूरति, मारुति नंदन

साधु संत के तुम रखवारे

असुर निकंदन, राम दुलारे

मंगल मूरति, मारुति नंदन

मंगल मूरति, मारुति नंदन

सकल अमंगल मूल निकंदन

ये जगत मिथ्या है, ये जानने के बाद भी छूटता क्यों नहीं। इसे छोड़ने का तरीका क्या है ?

sri sri ravi shankar answers

प्रश्न: कोई चीज़ मिथ्या हो तो उसे छोड़ना कठिन नहीं होता। ये जगत मिथ्या है ये जानने के बाद भी छूटता क्यों नहीं। इसे छोड़ने का तरीका क्या है ?
श्री श्री: अरे ! भगवान ने नहीं छोड़ा तो तुम क्यों छोड़ रहे हो। भगवान का अनुकरण करते हो तो छोड़ने की चेष्टा क्यों करते हो। न पकड़ने की चेष्टा करो, न छोड़ने की। सेवा करो। दुनिया है तो ये काम करने के लिए है। जबकि हम दुनिया की निंदा करते हैं। निंदा करने से तुम आगे नही बढ़ पाओगे। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि ये सृष्टि मेरी है, मेरी अपनी माया है ये, और मेरी कृपा से ही तरोगे। और तरने के लिए ही तो ये सब योगाभ्यास, ध्यान, साधना आदि हैं। ये सब अंतर्मुखी होने के लिए हैं। सेवा करने से आनंद मिलता है, और अगर समाज को पकड़ के कुछ चाहते हो तो दुःख मिलता है।

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