February 8, 2012 05:48 by
anisha
चित्त की शांति के लिये ख़ाली मन को ईश्वर की याद में भरकर र्खा जाये, तो यह सब से अधिक लाभदायक होगा। भंग या शराब हम में मस्ती नहीं भर सकती, मस्ती तो स्वयं हमारे ही अंदर है। मुसीबतों, बीमारियों, तकलीफ़ों और क्लेशों को ईश्वर का आशीर्वाद समझो जो हाथी के अंकुश की नाई तुमको ठीक उसी रास्ते पर लगाये रहते हैं। - यहां शोक, दुख, क्लेश और मुसीबतों की ज़िंदगी तो अवश्य ही है किन्तु यदि तुम इनसे बचना चाहो तो शुद्ध और सात्विक विचारों की वायु अपने चारों ओर फैलाते रहो – इस प्रकार सांसारिक चिन्ताओं की विषैली गैस तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी।
- वे लोग जो सदाचारी हैं और न्याय-संगत तथा स्वार्थ रहित जीवन, दूसरों की भलाई व सेवा में बिताते हैं, सच पूछा जाये तो वही ईश्वर की सच्ची सेवा करते हैं।
- ईश्वर को याद करते समय अपने आप को उसके समक्ष पूर्ण रूप से आत्म समर्पण कर दो और अपने जीव भाव को ईश्वरत्व के विश्वव्यापी भाव में विलीन कर दो, अर्थात अपने जीव की परिछिन्नता तो ईश्वर की अपरिछिन्नता में तल्लीन कर दो।
~ स्वामी रामतीर्थ (२२ अक्तूबर १८७३- दीपावली १९०६)
February 8, 2012 05:35 by
anisha
उपासना की जान समर्पण और आत्मदान है, यदि यह नहीं तो उपासना निष्फल और प्राण रहित है। - जिस जाति में भलाई, सत, या ईश्वर पर विश्वास, श्रद्धा या इसलाम नहीं हैं, वह जाति विजय नहीं पा सकती।
- जब तक सांसारिक दृष्टि वाली श्रद्धा, सीधी होकर आत्मा (कृष्णः) की सहगामिनी और तद्रूपा न होगी तब तक न तो अहंकार (कंस) मरेगा, और न स्वराज्य मिलेगा। मारो ज़ोर की लात इस उल्टे विश्वास को, अलिफ़ की भांति सीधी कर दो इस कुमारी श्रद्धा की कमर।
- ब्रह्मदर्शन की रीति आ गई तो जहां दृष्टि पड़ी, ब्रह्मानन्द लूटने लगे। प्रतीक उपासना तब सफल होती है जब वह हमें सर्वत्र ब्रह्म देखने के योग्य बना दे। सारा संसार मन्दिर बन जाये, हर पदार्थ राम की झांकी दिखाये और हर क्रिया पूजा हो जाये।
- वह आत्मदेव जिसकी शक्ति से संपूर्ण संसार स्थिर है और जिसकी शक्ति से संपूर्ण कामनायें पूरी होती हैं, उसको कोई विरले ही मांगते हैं और शेष सब संसारी वस्तुपं को, जो बिल्कुल तुच्छ, हीन और वास्तव में अवस्तु हैं, मांगते रहते हैं।
- धर्म शरीर और बुद्धि का आधार है। मन और बुद्धि का ईश्वर में लीन हो जाना ही धर्म है – ईश्वर को मानने वाले की बात और होती है और जानने वाले की और।
- वह व्यक्ति जो अपने समय का ठीक ठीक सदुपयोग करता है, सच पूछो तो वही जीवित मनुष्य कहलाने का अधिकारी है।
- वह व्यक्ति जिसको संसार के विषय और वासनायें नहीं हिला सकतीं, वह निस्सन्देह सारे संसार को हिला सकेगा।
- पवित्र आचरण, जितेन्द्रिय और शुद्ध विचारों से भरे हुये, सच्चे निश्चय वाले मनुष्य का शरीर और मन प्रकाश स्वरूप हो जाता है और ईश्वर का तेज और शान्ति-आभा उसके मुख मंडल पर साफ़ चमकने लगते हैं।
~ स्वामी रामतीर्थ (१८७३-१९०६)
February 8, 2012 04:55 by
anisha
यदि आपके जीवन में सांसारिक विषय भोगों तथा माया-मोह का बोलबाला नहीं है तो अवश्य ही आप संसार को प्रभावित करने की क्षमता प्राप्त कर लेंगे। - अपने दृष्टि-बिन्दु को एकदम बदल डालिये। हर एक चीज़ को ईश्वर रूप, ब्रह्म्रूप समझिये। ईश्वर और सृष्टि का जो संबन्ध है, वही आपका और संसार का संबन्ध होना चाहिये – पूर्ण परिवर्तन।
- उन्नति के लिये वायुमंडल तैयार होता है सेवा और प्रेम से, न कि विधि नेषेधात्मक आज्ञाओं और आदेशों से।
- आत्म भाव के क्षण वे हैं जब सांसारिक रिश्तों, सांसारिक सम्पत्ति, सांसारिक विषय वासना और आवश्यकता के विचार, एक ईश्वर के भाव में, एक सत्य में लीन हो जाते हैं।
- शरीर से ऊपर उठो, अपने इस व्यक्तित्व भाव को, अपने क्षुद्र अहंकार को जला दो, नष्ट कर दो, फूंक डालो – तब आप देखेंगे कि आप की इच्छायें सफल हो रही हैं।
- राम (स्वामी रामतीर्थ), भगवान बुद्ध, हज़रत मुहम्मद, प्रभु ईसा मसीह अथवा अन्य पैग़म्बरों के समान लाखों, करोड़ों अनुनायी नहीं बनाना चाहता। वह तो हर एक स्त्री, हर एक बच्चे में राम का ही प्रादुर्भाव करना चाहता है। उसके शरीर को, उसके व्यक्तित्व को कुचल डालो, रौंद डालो, पर सच्चिदानन्द आत्मा का अनुभव करो। यही राम की सेवा पूजा है।
- विश्वास की शक्ति ही जीवन है।
~ स्वामी रामतीर्थ (1876 से 1906)
February 8, 2012 04:16 by
anisha
जो शक्ति हम दूसरों की जांच-पड़ताल करने में नष्ट करते हैं, उसे हमें अपने आदर्श के अनुसार चलने में लगानी चाहिये। - वेदान्त के अनुसार, मानसिक एकाग्रता की विशेषता यह है कि हमें अपनी असली आत्मा को सूर्यों का सूर्य और प्रकाशों का प्रकाश अनुभव करना, साक्षात करना होता है।
- जैसे को तैसा आकर मिलता है। आप यहीं, इसी क्षण ईश्वर के आनन्द को अपने भीतर अनुभव करो – सफलता का आनन्द अपने आप, आप की ओर खिंचता हुआ चला आयेगा।
- सत्य को नष्ट नहीं किया जा सकता और असत्य कभी फल-फूल नहीं सकता।
- जो मनुष्य सब के प्रति अभेदना की भावना से ओत-प्रोत होता है, उसका हृदय, निर्भयता, शक्ति तथा आध्यात्मक पवित्रता का केन्द्र बन जाता है।
- सच्ची प्रीति और प्रेम जब उमड़ता है तो अन्धे को आंखें मिल जाने के समान होता है और दुनिया बदल जाती है।
- सब पापों से बचने और सब प्रलोभनों से ऊपर उठने का एकमात्र उपाय है, अपने सत्य-स्वरूप आत्मा का अनुभव करना।
~ स्वामी रामतीर्थ
February 8, 2012 04:02 by
anisha
विषय वासना-हीन प्रेम ही आध्यात्मिक प्रकाश है। - प्रेम का अर्थ है, व्यवहार में अपने पड़ोसियों के साथ, उन लोगों के साथ जिनसे आप मिलते जुलते हैं, एकता और अभेदना का अनुभव करना।
- कामना रहित कर्म ही सर्वोत्तम त्याग अथवा पूजा है।
- अहंकार-पूर्ण जीवन को छोड़ देना ही त्याग है, और वही सौंदर्य है।
- एक-एक में और सब में ईश्वरत्व का भान करना ही वेदान्त के अनुसार त्याग है।
- त्याग के अतिरिक्त और कहीं वास्तविक आनन्द नहीं मिल सकता; त्याग के बिना न तो ईश्वर-प्रेरणा हो सकती है, न प्रार्थना।
- सच्चा प्रेम, सूर्य के समान, आत्मा को विकसित कर देता है – मोह मन को पाले के समान ठिठुराकर संकुचित कर डालता है।
- प्रेम को मोह मत समझो – प्रेम और है, मोह और है – इन्हें एक समझना भारी भूल है।
- प्रेम का अर्थ है सौंदर्य का दर्शन करना।
~ स्वामी रामतीर्थ
January 30, 2012 11:24 by
anisha
- वेदान्त आप से यह अंगीकार कराना चाहता है कि सुख मात्र देने में है, लेने अथवा भीख मांगने में नहीं।
- वेदान्त दर्शन के प्रचार का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है इसे अपने आचरण में लाना – निर्लिप्त साक्षी के रूप में सब झंझटों से मुक्त होकर कर्म करो – सदा स्वतंत्र और निर्लिप्त रहो।
- संपूर्ण स्वर्ग आपके भीतर है – संपूर्ण सुख का स्रोत आपके भीतर है – ऐसी स्थिति में अन्यत्र आनन्द को ढूंढना कितना अनुचित और असंगत है।
- सांसारिक भोग-विलास की भूमि में बोये हुये बीज से अध्यात्मिक विकास का पौधा नहीं पनप सकता।
- दैवी विधान यह है कि मनुष्य मन से आराम में, शांति में, एवं क्षोभ-रहित अवस्था में रहे और तन से सदा काम में लगा रहे।
- अज्ञानवश तुम अपने को शरीर कहते हो प्रन्तु शरीर तुम हो नहीं, तुम अनन्त शक्ति हो, ईश्वर हो, नित्य और निर्विकार हो – तुम वही हो, उसे जानो और तुम फिर अपने को सारे संसार में और समस्त विश्व में ओत-प्रोत पाओगे।
~ स्वामी रामतीर्थ

January 30, 2012 10:58 by
anisha
शरीर से ऊपर उठो – समझो और अनुभव करो कि मैं अनन्त हूं – परमात्मा हूं, और इसलिये मुझ पर मनोविकार और लोभ भला कैसा प्रभाव डाल सकते हैं।
~ स्वामी रामतीर्थ