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Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 40 of 144

४०.

संकर से मुनि जाहि रटैं चतुरानन चारों ही आनन गावैं।

जो हिय नेक ही आवत ही मति मूढ़ महा ‘रसखान’ कहावैं॥

जापर देवी ओ देब निह्हरत बारत प्राण न वेर लगावैं।

ताहि अहीर की छोहर्या छछिया भर छाछ पै नाच नचावैं॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 39 of 144

३९.

योगिया ध्यान धरैं जिनको, तपसी तन गारि के खाक रमावै।

चारों ही वेद ना पावत भेद, बड़े तिर्वेदी नहीं गति पावैं॥

स्वर्ग औ मृत्यु पतालहू मे जाको नाम लिये ते सवै सिर नावैं।

चरनदास कहै, तेहि गोपसुता, कर माखन दै दै के नाच नचावैं॥

Sawaiya poetry from vrindavan is in Brajbhasha and is used beautifully in raslilas.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 37 of 144

३७.

चैन नहीं दिन रैन परै जब ते तुम नयनन नेक निहारे।

काज बिसार दिये घर के व्रजराज! मैं लाज समाज विसारे॥

मो विनती मनमोहन मानियो मोसों कबू जिन हूजियो न्यारे।

मोहि सदा चितसों अनि चाहियो नीके कै नेह निबाहियो प्यारे॥

Sawaiya verses from Vrindavan are an expression of devotion to Sri Radha Krishna.

Surdas bhajan lyrics, Sabse oonchi prem sagaai

सबसे ऊंची प्रेम सगाई

१. दुर्योधन के मेवा त्याग्यो, साग विदुर घर खाई

४. जूठे फल शबरी के खाये, बहु विधि स्वाद बताई

३. राजसूय यज्ञ युधिष्ठिर कीन्हा, तामे जूठ उठाई

५. प्रेम के बस पारथ रथ हांक्यो, भूल गये ठकुराई

६. ऐसी प्रीत बढ़ी वृन्दावन, गोपियन नाच नचाई

२. प्रेम के बस नृप सेवा कीन्हीं, आप बने हरि नाई

७. सूर क्रूर एहि लायक नाहीं, केहि लगो करहुं बड़ाई

Surdas was one of the Ashtsakha (8 friends of Krishna), appointed by Mahaprabhu Vallabhacharya ji to perform Raga seva to Sri Govardhan Nath ji (the Krishna deity, uncovered by Mahaprabhu ji on Govardhan Hill near Vrindavan, Mathura.

Pandit Jasraj sings Sab se oonchi prem sagaai

Sri Banke Bihari ji ke sawaiye, 32 of 144, A search for nirgun and sagun Brahman

३२.

ब्रह्म में ढूंढ्यो पुरानन वेदन भैद सुन्यो चित चौगुने चायन।

देख्यो सुन्यो न कहूं कबहूं वह कैसे स्वरूप औ कैसे सुभायन॥

ढूंढत ढूंढत हारि परयो ‘रसखानि’ बतायो न लोग लुगायन।

देख्यो कहां वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटन राधिका पायन॥

This sawaiya verse illustrates poet Raskhan’s search for nirgun and sagun Brahman.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 31 of 144

३१.

धूरि भरे अंग सोहन मोहन आछी बनी सिर सुन्दर चोटी।

खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनियां कटि पीरी कछौटी।।

या छवि कूं ‘रसखान’ विलोकत बारत काम कलानिधि कोटी।

काग के भाग कहा कहिये हरि हाथ ते लै गयो माखन रोटी॥

A Braj sawaiya by poet Raskhan.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 27 of 144

२७.

ज्यों भरि कै जल तीर धरी निरखे त्यों अधीर ह्वै न्हात कन्हाई।

जानैं नहीं तेहि ताकन में ‘रतनाकर’ कीन्ही महा टुनहाई॥

छाई कछू हरू आई शरीर में नीर में आई कछू गरुआई।

नागरी की नित की जो सधी साई गागरी आज उठ न उठाई॥

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