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Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 43 of 144, Virah bhaav

Krishna and Meera, Braj ke sawaiya

४३.

मनमोहन सों बिछुरी जबसों तन आँसुन सौ सदा धोवती हैं।

‘हरिचन्द’ जू प्रेम के फन्द परी कुल की कुललाजहिं खोवती हैं॥

दुख के दिन को काहू भाँति बितै विरहागिन रैन संजोवती हैं।

हम ही अपनी दशा जाने सखी निसि सोवती हैं किधौं रोवती हैं॥

More sawaiya verses in Braj bhasha

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 42 of 144

४२.

मोरपखा गल गुंज की माल किये बर बेष बड़ी छबि छाई।

पीत पटी दुपटी कटि में लपटी लकुटी ‘हटी’ मो मन भाई॥

छूटीं लटैं डुलैं कुण्डल कान, बजै मुरली धुनि मन्द सुहाई।

कोटिन काम ग़ुलाम भये जब कान्ह ह्वै भानु लली बन आई॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 41 of 144

४१.

अन्त रहौ किधौं अन्तर हौ दृग फारे फिरौं कि अभागिन भीरूं।

आगि जरौं या कि पानी परौं, अहओ कैसी करौं धरौं का विधि धीरूं॥

जो ‘घनआनन्द’ ऐसौ रूची, तो कहा बस हे अहो प्राणन पीरूं।

पाऊं कहां हरि हाय तुम्हें, धरनी में धंसूं कि अकाशहिं चीरूं॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 40 of 144

४०.

संकर से मुनि जाहि रटैं चतुरानन चारों ही आनन गावैं।

जो हिय नेक ही आवत ही मति मूढ़ महा ‘रसखान’ कहावैं॥

जापर देवी ओ देब निह्हरत बारत प्राण न वेर लगावैं।

ताहि अहीर की छोहर्या छछिया भर छाछ पै नाच नचावैं॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 38 of 144, Prayer to Krishna

३८.

ऐसी करा नव लाल रंगीले जू चित्त न और कहूं ललचाई।

जो सुख दुख रहे लगि देहसों ते मिट जायं आलोक बड़ाई॥

मागति साधु वृन्दाबन बास सदा गुण गानन मांहि विहाई।

कंज पगों में तिहारे बसौं नित देहु यहै ‘ध्रुय’ को ध्रुवताई॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 39 of 144

३९.

योगिया ध्यान धरैं जिनको, तपसी तन गारि के खाक रमावै।

चारों ही वेद ना पावत भेद, बड़े तिर्वेदी नहीं गति पावैं॥

स्वर्ग औ मृत्यु पतालहू मे जाको नाम लिये ते सवै सिर नावैं।

चरनदास कहै, तेहि गोपसुता, कर माखन दै दै के नाच नचावैं॥

Sawaiya poetry from vrindavan is in Brajbhasha and is used beautifully in raslilas.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 37 of 144

३७.

चैन नहीं दिन रैन परै जब ते तुम नयनन नेक निहारे।

काज बिसार दिये घर के व्रजराज! मैं लाज समाज विसारे॥

मो विनती मनमोहन मानियो मोसों कबू जिन हूजियो न्यारे।

मोहि सदा चितसों अनि चाहियो नीके कै नेह निबाहियो प्यारे॥

Sawaiya verses from Vrindavan are an expression of devotion to Sri Radha Krishna.

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