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Roadmaps to joy!

Art of Living Bhajan, Tum se ho jori

तुम से हो जोड़ी, साची प्रीत हम तुम से हो जोड़ी

तुम से हो जोड़ी, अवर संग तोड़ी…

तुम से हो जोड़ी, साची प्रीत हम तुम से हो जोड़ी

जह जह जाऊं वहां तेरी सेवा, तुम सौ ठाकुर, और ना देवा…

Jo nar dukh mein dukh nahi mane, a message for spiritual seekers

Guru Tegh Bahudar's Shabad renderd by Shrikant Bakre

A message for spiritual seekers from Sri Guru Granth Sahib:

जो नर दुख में दुख नहिं मानै।
A person who does not wallow in sorrow and does give undue importance to sorrow,

सुख सनेह अरु भय नहिं जाके, कंचन माटी जानै।।
Who is not craving for happiness, and is not afraid; who knows gold and mud to be the same in essence,

नहिं निंदा नहिं अस्तुति जाके, लोभ-मोह अभिमाना।
Who is not influenced by criticism or praise; who is free of greed, attachment and an egocentric approach to life.

हरष शोक तें रहै नियारो, नाहिं मान-अपमाना।।
Who is not disturbed by joy and sorrow, respect and insult

आसा मनसा सकल त्यागि के, जग तें रहै निरासा।
Since he has no craving for fulfillment of desires, he wants nothing from the world and its people;

काम, क्रोध जेहि परसे नाहीं, तेहि घट ब्रह्म निवासा।।
Who does not have even a spec of craving and anger, in such a person the divine consciuosness of Brahm is evident and manifest.

गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्हीं, तिन्ह यह जुगुति पिछानी।
By the grace of a Sadguru, a person discovers the technique to do so.

नानक लीन भयो गोबिंद सों, ज्यों पानी सों पानी।।
Guru Nanak has dissolved in Govind (God) just as water mixes with water. He has become one with Govind. [Aham Brahmasmi]

~ Guru Teg Bahadur

Sukhmani Sahib, Hindi text 2

असटपदी

सिमर‍उ सिमिरि सिमिरि सुखु पाव‍उ ॥

कलि कलेस तन माहि मिटाव‍उ ॥

सिमर‍उ जासु बिसुंभर एकै ॥

नामु जपत अगनत अनेकै ॥

बेद पुरान सिंम्रिति सुध्याखर ॥

किनका एक जिसु जीअ बसावै ॥

ता की महिमा गनी न आवै ॥

कांखी एकै दरस तुहारो ॥

नानक उन संगि मोहि उधारो ॥

सुखमनी सुख अंम्रित प्रभ नामु ॥

भगत जना कै मनि बिस्राम रहाउ ॥

प्रभ कै सिमरनि गरभि न बसै ॥

प्रभ कै सिमरनि दूखु जमु नसै ॥

प्रभ कै सिमरनि कालु परहरै ॥

प्रभ कै सिमरनि दुसमनु टरै ॥

प्रभ सिमरत कछु बिघनु न लागै ॥

प्रभ कै सिमरनि अनदिनु जागै ॥

प्रभ कै सिमरनि भ‍उ न बिआपै ॥

प्रभ कै सिमरनि दुखु न संतापै ॥

प्रभ का सिमरनु साध कै संगि ॥

सरब निधान नानक हरि रंगि ॥

॥ २. ॥

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