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Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 27 of 144

२७.

ज्यों भरि कै जल तीर धरी निरखे त्यों अधीर ह्वै न्हात कन्हाई।

जानैं नहीं तेहि ताकन में ‘रतनाकर’ कीन्ही महा टुनहाई॥

छाई कछू हरू आई शरीर में नीर में आई कछू गरुआई।

नागरी की नित की जो सधी साई गागरी आज उठ न उठाई॥

Sri Banke Bihari ke sawaiya, 26 of 144

२६.

दे लिखि बांहन पे व्रजचन्द्र सो गोल कपोलन कुंज बिहारी।

त्यों ‘पदमाकर’ हीय हरी लिखि गोसो गोविन्द गरे-गिरिधारी॥

या बिधि ते नख से सिख लौं लिख कन्त के नाम अनन्त है प्यारो।

गोरे से अंग में गोद दे श्याम सो हे गोदनान की गोदनहारी॥

In this sawaiya verse by Braj poet Padmakar, in fond remembrance of Krishna (smaran bhakti, स्मरण भक्ति) Gopi is asking a tattoo-maker to tattoo several of Krishna’s names on her body.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 25 of 144

२५.
तेरी न चेरी न तेरे ददा की, न कोल्हूं में डारि पेराइ देवै हों।
खैचत हौ अंचरा गहि कै, फटि हे चुनरी कमरी दे के जै हों॥
टूटेंगे हार हमेल हजार  तौ नन्द जसोदा समेत बिकै हों।
राजी चहौ दधि खाओ भला वरि आई लला एक बूंद न पैहों॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 24 of 144

२४.
मंजुल मोरपखा छहरै छवि सों जब ग्रीव कछु मटकावत ।
नूपुर की झनकारन पै झुकि ग्वालिन गोधन गीत गवांवत ॥
आननचन्द सु मन्द हंसी ‘रतनाकर’ माल हिये लहरावत ।
देखि सखी वह मैन लजावत सांवरो बेनु बजावत आवत ॥

Krishna in Vrindavan :-)

Krishna bhajan from Vrindavan, tum ho nandlal janam ke kapati

तुम हो नंदलाल जनम के कपटी

औरों की गागर नित उठ भरते, मेरी मटकी मझधार में पटकी

तुम हो नंदलाल जनम के कपटी

औरों का माखन नित उठ खाते, मेरो माखन अधरन बिच अटक्यो More...

Krishna bhajan, Ikli ban me gheri aan, Shyam tane kaisi thhani re

इकली बन में घेरी आन, श्याम तने कैसी ठानी रे

श्याम मोहे बृन्दाबन जानो रे, लौट के बरसाने आनो रे

जो होई देर अबेर, लड़े घर सास-जिठानी रे More...

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 23 of 144

२३.
सांवरी राधिका मान कियो परि पांयन गोरे गोविन्द मनावत ।
नैन निचौहे रहं उनके नहीं बैन बिनै के नये कहि आवत ॥
हारी सखी सिख दै ‘रतनाकर’ हेरि मुखाम्बुज फेरि हंसावत ।
ठान न आवत मान इन्हैं उनको नहिं मान मनाबन आवत ॥

Poet Ratnakar says in this sawaiya:

When Radha was annoyed with Krishna, Krishna bowed at her feet requesting her for truce. He didn’t really know how to please her. Neither did Radha really know how to show anger, observes the poet.

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