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Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 35 of 144

Sri Govind Dev ji, Jaipur

३५.

मन में बसी बस चाह यही प्रिय नाम तुम्हारा उचारा करूं।

बिठला के तुम्हें मन मंदिर में मन मोहन रूप निहारा करूं॥

भर के दृग पात्र में प्रेम का जल पद पंकज नाथ पखारा करूं।

बन प्रेम पुजारी तुम्हारा प्रभो नित आरती भव्य उतारा करूं॥

Sri Banke Bihari ke sawaiya, 34 of 144, वे तो लली वृषभान लली की गली के गुलाम हैं

Sawaiya verses are part of the rich literary heritage of Braj (Mathura-Vrindavan). They are dramatised in raslila performances.

३४.

द्वार के द्वारिया पौरि के पौरिया पाहरुवा घर के घनश्याम हैं।

दास के दास सखीन के सेवक पार परोसिन के धन धाम हैं॥

‘श्रीधर’ कान्ह भये बस भामिनि मान भरी नहीं बोलत बाम है।

एक कहै सखि वे तो लली वृषभान लली की गली के गुलाम हैं॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiye, 32 of 144, A search for nirgun and sagun Brahman

३२.

ब्रह्म में ढूंढ्यो पुरानन वेदन भैद सुन्यो चित चौगुने चायन।

देख्यो सुन्यो न कहूं कबहूं वह कैसे स्वरूप औ कैसे सुभायन॥

ढूंढत ढूंढत हारि परयो ‘रसखानि’ बतायो न लोग लुगायन।

देख्यो कहां वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटन राधिका पायन॥

This sawaiya verse illustrates poet Raskhan’s search for nirgun and sagun Brahman.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 31 of 144

३१.

धूरि भरे अंग सोहन मोहन आछी बनी सिर सुन्दर चोटी।

खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनियां कटि पीरी कछौटी।।

या छवि कूं ‘रसखान’ विलोकत बारत काम कलानिधि कोटी।

काग के भाग कहा कहिये हरि हाथ ते लै गयो माखन रोटी॥

A Braj sawaiya by poet Raskhan.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 30 of 144, Straight from a Gopi’s heart

३०.

सुन्दर मूरति दृष्टि परी तब ते जिय चंचल होय रहा है।

सोच सकोच सभी जो मिटे अरु बोल कुबोल सभी जो सहा है॥

रैन दिना मोहि चैन न आवति, नैनन सों जल जात बहा है।

तापै कहैं सखि लाज करौ अब लागि गई तब लाज कहा है॥

In this Braj sawaiya verse, the poet pens a Gopi’s state of mind on seeing Krishna:

The Gopi shares, “I am restless ever since I’ve seen Krishna. All my thoughts and conflicts are gone. All the good and bad things that people have ever said to me have disappeared from my mind. Now I shed tears of longing for Krishna. Every day and night this longing is with me. My friends say, ‘Have some shame.’ And I answer, ‘Love for Krishna has overwhelmed me so completely that there is no place for shame.’”

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 29 of 144, Maharaas in Vrindavan

२९.

मण्डल रास बिलास महा रसमण्डल श्री वृषभान दुलारी।

पंडित कोक चला गुण मण्डित कोटिक राजत गोपकुमारी॥

प्रीतम के भुज दण्ड में शोभित संग में अंग अनंगन वारी।

तान तरंगन रंग बढ़्यो, ऐसे राधिका माधव की बलिहारी॥

God is always in union (Maharaas) with creation, though we don’t always realize it. This sawaiya verse by a Braj poet, depicts the episode when God came as Sri Radha and Krishna - to love and be loved.

Gopis of Vrindavan had prayed to Ma Katyayani on the banks of River Yamuna (Yamuna ji is also Krishna’s wife and she is a symbol of love, a giver of devotion to Krishna.) The prayer was to have Krishna as their master/caretaker/husband. God is already everyone’s caretaker and master. More...

Sri Banke Bihari ke sawaiya, 28 of 144

२८.

बैठी हती गुरु लोगन में मन ते मनमोहन को न विसारति।

त्यों नन्दलाल जू आय गये बन ते सिर मोरन पंख संवारत॥

लाज ते पीठ दै बैठि बहू, पति मातु की आंख ते आंखिन टारति।

सासु की नैंन की पूतरी में निज प्रीतम को प्रतिबिम्ब निहारति॥

This sawaiya verse says:

A Gopi is sitting amidst family elders, and is thinking of Krishna. Just then Krishna arrives from the jungle, with a peacock feather tucked in his hair.

The Gopi feels shy and turns her back to Krishna, while looking into her mother-in-law’s eyes to catch his reflection there.

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