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Vrindavan bhajan for Sri Radha Rani

मेरे गिनियो ना अपराध, लाड़ली श्री राधे

मेरे गिनियो ना अपराध किशोरी श्री राधे

१. जो तुम मेरे अवगुन देखो, तो नाही कोई गुण हिसाब, लाड़ली श्री राधे

२. अष्ट सखी और कोटि गोपिन में, उनकी दासी को दासी मैं, लाड़ली श्री राधे

    वहीं लिख लीजो मेरो नाम, लाड़ली श्री राधे

३. माना कि मैं पतित बहुत हूं, हौ पतित पावन तेरो नाम, लाड़ली श्री राधे

    किशोरी मेरी श्री राधे, लाड़ली श्री राधे, स्वामिनी श्री राधे

Feeling grateful for the oral traditions of India :) My heritage.

Swami Sri Haridas’s Ashtadas Sidhant, Verse 6, Ragani Aasavari

॥ रागनी आसावरी ॥

वंदे अख्त्यार भला।

चित न डुलाव आव समाधि भीतर न हो‍हु अगला॥

न फिर दर दर पिदर दर न होअहु अंधला।

कहें श्री हरिदास करता कीया सो हुआ सुमेरू अचल चला॥६॥

Sri Haridas

Kaliya Nag and Krishna, in a poem from Vrindavan, Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 49 of 144

४९.

कारेइ मोहन कारेइ सोहन, कारी कालेन्दजा के तट आयो।

खेलत गेंद गिरी दह में तब कारे से नाग लो जाय जगायो॥

नाग को नाथ लियो छिन में अरु कारे के सीस पै नृत्य करायो।

‘गोविंद’ यों प्रभु शोभा बखानत कारे कौ नाथ के नाथ कहायो॥४९॥

This Sawaiya verse depicts the episode of Kaliya-manthan in Vrindavan. Poet Govid says:

“Krishna was playing with a ball with his friends on the banks of dark, deep waters of River Yamuna, when his ball fell into Kaliya-dah, a part of the river where Kaliya Nag, the thousand-headed snake lived. Krishna fought with Kaliya and emerged victorious, dancing on Kaliya’s heads. I cannot describe in words the awesome scene…”

Kaliya Nag is a symbol of the 5 senses, and the episode signifies that the master of the senses should be Krishna, else the waters of life would be poisoned by the craving and misery that the senses are capable of bringing, just like the presence of Kaliya Nag in Kaliya-dah, Vrindavan, poisoned the fresh river water.

Raskhan ke dohe, Sri Banke Bihari ke sawaiya, 48 of 144

४८.

खंजन नैन फंसे छवि पिंजर, नाहिं रहैं थिर कैसेहु माई।

छूटि गई कुल कानि सखी ‘रसखान’ लखी मुसकानि सुहाई॥

चित्र लिखी सी भई सब देह न वैन कढ़ै मुख दीन्हें दुहाई।

कैसी करूं जित जाऊं तितै सब बोलि उठैं वह बांवरी आई॥४८॥

Meaning of this sawaiya verse by  Raskhan

My eyes have been arrested by the all attractive sight of Krishna :-)

On seeing Krishna, the treasure of bliss, smile at me, I forget my social attachments. My state is such that I am still like a picture, my body is still, no words escape my lips. Wherever I go, people say, ‘O, she is crazy!’

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 44 of 144

४४.

केहि पापसों पापी न प्राण चलैं अटके कित कौन विचारलयो।

नहिं जानि परै ‘हरिचन्द’ कछू विधि ने हमसों हठ कौन ठयो॥

निसि आज हू हाय बिहाय गई बिन दर्शन कैसे न जीव गयो।

हत भागिनी आंखन सों नित के दुख देखबे को फिर भोर भयो॥४४॥

More Braj ke sawaiya/dohe

Swami Haridas’s Ashtadash Sidhant, Verse 5, Raga Vilaaval

श्री कुंजविहारिणे नमः

॥ राग विलावल ॥

ए हरि! मोसौ न विगारन कौ, तोसो न संभारन कौ, मोहि तोहि परी होड़।

कौनधौ जीते कौनधौ हारें, पर बदी न छोड़॥

तुम्हारी माया बाजी विचित्र पसारी, मोहे मुनि सुनि भुले काके कोड़।

कहें श्री हरिदास हम जीते, हारे तुम, तो‍उ न तोड़॥५॥

Sri Haridas says, ‘O, Hari, I am competing with you. There is none who can mess up things more than me, and there is none who can make things alright as you can…. Even if I win, I am a loser in reality.’

Swami Sri Haridas’s Ashtadash Sidhant, Verse 3, An ode to Sri Banke Bihari

श्री कुंजविहारिणे नमः

॥राग विभास॥

कबहूं कबहूं मन इत उत जात याते अब कौन अधिक सुख।

बहुत भांतिन घत आनि राख्यो नाहिंतौ पावतौ दुःख॥

कोटि काम लावण्य बिहारी ताके, मुंहाचुहीं सब सुख लिये रहत रुख।

श्री हरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी कों, दिन देखत रहौ विचित्र मुख॥

Sri Haridas ji says, ‘Many times the mind gets distracted but there is no pleasure in that. I bring it back to my center, else this mind would make me very unhappy. Sri Banke Bihari’s divine beauty is so enticing and the greatest of pleasures. With wonder and adoration I look at my masters Sri Radha Rani and Sri Krishna.’

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