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Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 44 of 144

४४.

केहि पापसों पापी न प्राण चलैं अटके कित कौन विचारलयो।

नहिं जानि परै ‘हरिचन्द’ कछू विधि ने हमसों हठ कौन ठयो॥

निसि आज हू हाय बिहाय गई बिन दर्शन कैसे न जीव गयो।

हत भागिनी आंखन सों नित के दुख देखबे को फिर भोर भयो॥४४॥

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Radha Krishna aarti video and lyrics from Rangeeli Mahal, Barsana

आरती प्रीतम प्यारी की, कि बनवारी नथवारी की

दुहुन सिर कनक मुकुट छलके

दुहुन श्रुति कुण्डल भल हलके

दुहुन दृग प्रेम सुधा छलके

चसीले बैन, रसीले नैन, गसीले सैन

दुहुन मैनन मनहारी की

कि बनवारी नथवारी की

आरती प्रीतम प्यारी की, कि बनवारी नथवारी की

दुहुनि दृग चितवनि पर वारी

दुहुनि लट लटिकनि छवि न्यारी

दुहुनि भौं मटकनि अति प्यारी

रसन मुख पान, हंसन मुस्कान, दसन दमकान

दुहुनि बेसर छवि न्यारी की

कि बनवारी नथवारी की

आरती प्रीतम प्यारी की, कि बनवारी नथवारी की

एक उर पीतांबर फहरे, एक उर नीलांबर लहरे

दुहुन उर लर मोतिन छहरे

कनकानन कनक, किंकिनी झनक, नुपुरन भनक

दुहुन रुन झुन धुनि प्यारी की

कि बनवारी नथवारी की

आरती प्रीतम प्यारी की, कि बनवारी नथवारी की

एक सिर मोर मुकुट राजे

एक सिर चूनर छवि साजे

दुहुन सिर तिरछे भल भ्राजे

संग ब्रजबाल, लाडली लाल, बांह गल डाल

‘कृपालु’ दुहुन दृग चारि की

कि बनवारी नथवारी की

आरती प्रीतम प्यारी की, कि बनवारी नथवारी की

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 43 of 144, Virah bhaav

Krishna and Meera, Braj ke sawaiya

४३.

मनमोहन सों बिछुरी जबसों तन आँसुन सौ सदा धोवती हैं।

‘हरिचन्द’ जू प्रेम के फन्द परी कुल की कुललाजहिं खोवती हैं॥

दुख के दिन को काहू भाँति बितै विरहागिन रैन संजोवती हैं।

हम ही अपनी दशा जाने सखी निसि सोवती हैं किधौं रोवती हैं॥

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Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 35 of 144

Sri Govind Dev ji, Jaipur

३५.

मन में बसी बस चाह यही प्रिय नाम तुम्हारा उचारा करूं।

बिठला के तुम्हें मन मंदिर में मन मोहन रूप निहारा करूं॥

भर के दृग पात्र में प्रेम का जल पद पंकज नाथ पखारा करूं।

बन प्रेम पुजारी तुम्हारा प्रभो नित आरती भव्य उतारा करूं॥

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 31 of 144

३१.

धूरि भरे अंग सोहन मोहन आछी बनी सिर सुन्दर चोटी।

खेलत खात फिरै अंगना पग पैजनियां कटि पीरी कछौटी।।

या छवि कूं ‘रसखान’ विलोकत बारत काम कलानिधि कोटी।

काग के भाग कहा कहिये हरि हाथ ते लै गयो माखन रोटी॥

A Braj sawaiya by poet Raskhan.

Sri Banke Bihari ji ke sawaiya, 20 of 144

A sawaiya verse by Raskhan

Krishna painting

२०.
ए सजनी वह नन्द को साँवरो, या बन धेनु चराय गयो है ।
मोहन तानन गोधन गाय के वेणु बजाय रिझाय गयो है ॥
ताही घरी कछु टोना सो कै, ‘रसखानि’ हिये में समाय गयो है ।
को‍ऊ न काहू की कानि करै, सिगरो ब्रज बीर बिकाय गयो है ॥

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